Monday, March 08, 2021

भेद से परे

मुझे इन भेद से परे उठना हे,
भेडियो के बीच नही, शेर बन कर रहना हे।
बिक गया है ईमान वहां मान कहा मिले, मिलता है सन्नमान भी बाजारों पर।
बस जब से मेरी नज़र तुजसे हो
कठिन घना सफर तुजसे तुज तक हो।
एकत्व के तत पर, प्रेम से मेरी सब गत हो।
आंखे अब रूप ना देखे, जो जान गई हो तत को।
जब जान लिया तत्वरस तो रूप रंग का भेदना हो।
भेद से तो जन्मी थी वेदना
वरना चेतना में कहा होता तेरा मेरा।

अब सचेतन हु, देखता हूं 
इस आवागमन को
दमन उफ़न मस्त कष्ठ सब
परिवर्तित तेरे आनंद में।

में अब सचेतन हु।

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