Thursday, May 13, 2021

आज

आज से प्रारंभ,
आज ही अंत।
आज जीवन,
आज मौत।
काज किसके,
आज मिलता?
काज मुझसे,
आज खिलता?
काश मे भी
आश चुनता।
आज सजाये,
आज वधाये।
आज को अपना
ताज बनाये।






उसका

आनंद भी उसका,
आतंक भी उसका
आक्रंद भी उसका,
आक्रोश भी उसका,
आवाज भी उसका
आधार भी उसका।

उसको सब कहते, करते,
या उसके कराये, रहते।
राहत नही,जब तक चाहत
जानत नही जब तक भागत।



Wednesday, May 12, 2021

अमावस

आज अमावस जगी हे,
आसपास तुम नही हो।
यादों कि रोशनी मत जलावो
कुछ ज़ख्म जग जाएंगे।

अंधेरो से मुझे डर नही,
डर मुझे उन सितारो से हे।
जिन्होंने बस दूर रह कर तमाशा देखा,
यह कहते रहे तुम आश रखना,
पर हम नही आएंगे।
तुम्हारे साथ हे, पर कामके नही,
मुझे गिनना और वाह ! वाह ! कहना
सब तो विनिमय हे अब, विनम्र कहा।

आज अमावस जगी हे,
आसपास तुम नही हो।

अगर
मा
विचरे
सृष्टि।

पर किसका आवास यहाँ?

कल अमावस थी,
आज उसका आवास नही।

कल ईद, पूर्णिमा भी आएंगे,
पर किसका आवास यहाँ?
पल के लिए आते जाते,
साथी सारे नाते रिश्ते,
पर कल अमावस थी,
आज उसका आवास नही।
पर किसका आवास यहाँ?
दुःख सुख का आवास कहाँ?
जीवन मृत्यु का आवास कहाँ?
देखनेवाला बोल गया,
हरि का आवास हे सब, 
हरि मे सब का वास यहाँ।
दृष्टि मे रखे अपनी सृष्टि,
पल पल मथता अपनी तृप्ति
वो में कैसे देखे जग मे 
वास हरि का सब मे।
कल अमावस, आज पूर्णिमा
गिनता रहता, हिसाब करता
कितना बनाया,कितना बिगाड़ा?
किसने किया, क्यों किया?
अपना नाम - नाते जपता रहता,
यम को वह रोज हप्ता देता,
सभी कार्य को करता रहता,
प्रश्न यह निरंतर रहता,
किसका आवास यहाँ?
जंगल जल रहे,
चीताये जल रही,
सत्य के संग संग
जीवन दफनाया,
कथन कफ़न का
जब याद आया,
साँस थी आखिर
आती जाती
पर इन साँसों का वास कहाँ?
पर इन साँसों का वास कहाँ?
पता मिल जाए 
तो बता देना
साँस चल रही
तब तक
चलते रहेंगे
सत्य को आवाज़ हरदम देंगे,
यह प्रश्न सदा गूंजते रहेंगे
किसका है आवास यहाँ?

Monday, March 08, 2021

भेद से परे

मुझे इन भेद से परे उठना हे,
भेडियो के बीच नही, शेर बन कर रहना हे।
बिक गया है ईमान वहां मान कहा मिले, मिलता है सन्नमान भी बाजारों पर।
बस जब से मेरी नज़र तुजसे हो
कठिन घना सफर तुजसे तुज तक हो।
एकत्व के तत पर, प्रेम से मेरी सब गत हो।
आंखे अब रूप ना देखे, जो जान गई हो तत को।
जब जान लिया तत्वरस तो रूप रंग का भेदना हो।
भेद से तो जन्मी थी वेदना
वरना चेतना में कहा होता तेरा मेरा।

अब सचेतन हु, देखता हूं 
इस आवागमन को
दमन उफ़न मस्त कष्ठ सब
परिवर्तित तेरे आनंद में।

में अब सचेतन हु।

Saturday, March 06, 2021

महाकाल और सावित्री

वोह भी एक काल था
जो चलना सीखा गया
अंतर जगत की खोज का
प्रदीप जला गया

रूपांतर की चाबी से
अंतर मिटा गया
वोह भी एक काल था
जो महाकाल से मिला गया

कल कल करके बह चला
ठहरना बता गया
नित नित्य नीति पे, से
खुलना सीखा गया।

वैभव
०६/०३/२०२१

निवेदन - 11 मार्च को महाशिवरात्रि के दिन , महाकाल के साथ सावित्री के माध्यम से भेंट करने का सोचा हे। अगर आप जुड़ना या जानकारी चाहिए तो संदेश भेजे। धन्यवाद।


Sunday, February 28, 2021

Kathak aaur Me

 


यह कथक जो  


गुरु शिष्य परम्परा से चलता आया

ज्ञान मनोरंजन भक्ति को पाना 

जीवन कथा को नृत्य रूप दिखाना   

मंदिर दरबार से रंगमंच तक छाया।  


कथनी करनी को हर रस में सजाना 

घुंघरू संग ताल पर नाचना - नचाना 

पलटे भाग्य रंग अभिनय दिखाना 

बहिर्मुख से अंतरंग को जाना। 


कथक का मेरे जीवन में आना

जैसे प्रेमी का प्रीतम को पाना

साधना का यह मार्ग अनोखा

लय यात्री की आरोह गत-चाल चलना  


इस तन की धारा का होमित होना 

भूतल से परमप्रिय  को पुकारना

जैसे राधा - मीरा का समर्पित होना

कुछ ऐसा मैंने तत्कार के बोलो को जाना 


ता थई थई तत

आ थई थई तत।।  २।। 


परमप्रिय को अपनी बात बताना

जीवन में स्थिरता को पाना

सम आदि का ध्यान लगाना

कथक से मेने खुद को जाना। 

कथक से मेने खुदा  को पान। 


- vaibhav pandya
February 2021

for


Optics of Life

The shadow puppet show of life, My lord watches through Million pin-hole camera. Where is lord supreme, I don't know. What I feel is all...