Tuesday, August 01, 2023

deal with death to be alive - maybe part 1

मृत्यु के साथ आप कैसे सौदा और समझोता करते हो, इसी पर आप जिंदा दिल हो की नही, सचमे जीवित हो के नही ये पता चलता हे. 
कल , कब , किस क्षण वो आनेवाला हे, उससे तो हम सब अंजान है। परंतु इतना जरूर जानते हे की, उसे आना हे। जब तक हम अमृत्व प्राप्त न करले, तब तक यह मृत्यु इस स्वरूप मे आएगा। 
आज एक मित्र के साथ अपनी कहानी (जीवनी) सांझा करते हुवे यह ध्यान में आया की जीवन के कुछ अहम निर्णय में  काल (समय और मृत्यु) ने अपना भाग खेला हे। 

पहले वो बहुत देर के बाद आता था। आजकल उसकी गति तेज हो गई हे। काल किसने देखा तो नही हे। इसलिए कैसे याद रहे वो।
हम भूल जाते हे। हम डर जाते हे।

भूलना और डर जाना यह दो काल के साथ और काल में न चल पाने के प्रमुख कारण हे। 
या तो हम समय और यम को भूल गए होते हे, या फिर उसके डर से जीवन को जिते हे। बहुत कुछ लिखा जा सकता हे यहां पर। परंतु लिखना समझना से ज्यादा जरूरी समय को अनुभव करना हे, उसकी लय, ताल के संग चलना जरूरी हे। समझ और समझ को प्रस्तुत करने के लिए भाषा यह तो आ जाती हे। ना भी आए तो कोई ज्यादा फर्क नही पड़ता। 

पिछले हफ्ते ही, विज्ञान की कक्षा मे यह सवाल आया था, की समय कैसे भौतिक राशि हो सकती है? उसका एक उत्तर समय की व्याख्या जैसे की गई हे उससे आता हे। समय यानी दो घटना के बीच का अंतर। ओर अगर वो घटना हमारे आंखो के सामने ना हुवि तो दूसरे माध्यम से उसे ढूंढते या अनुमान लगाते हे। 

विज्ञान और धर्म (religion) ने हमे कुछ तरीको से समय याने काल याने मृत्यु के साथ जीना सिखाया हे। सब अपनी अपनी समझ, क्षमता ओर शक्ति के आधार पर एक सौदा कर लेते ही मन के अंदर कही। ओर समय को भूल जाते हे। ओर जब अचानक याद आता हे, तो वो ज्यादा भय उत्त्पन करता है। उसके मोह मे कितने सारे और कार्य करते ही होंगे। 
समय की तरंग


Contd।

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