Friday, October 19, 2018

एक सवाल

एक सवाल सामने खड़ा।
पर्बत या पेड़।
एक सवाल सामने खड़ा पर्बत बन।
क्या आँसुओकी धारा बही?
शिखरों को सर करना
हिम्मत चाहिये,
सवाल को सर पर रखना।
तुम, बस प्रतिकमा करते रहो,
कभी ना कभी कृपा बरसेंगी।
कभी धारा बहती मिली
तो तुम भी बह जाना।
तुम एक थोड़ी हो,
तुम तो हमेशा अनेको के साथ जुड़े हो।
तुम्हारे पास एक सवाल थोड़ी है,
जिंदगी आये दिन तुम्हारे सामने
खड़े करती है सवाल।
पर तुम वो एक सवाल जो पर्बत बन खड़ा उसे नही,
वह सैकड़ो सवाल को सर करते रहना।
एक सवाल सामने खड़ा पेड़ बन
कौन कौन से फल फूल देगा वोह?
कब देगा?
किसको देगा?
वो तो चुपकीदी साधे बैठा है।
तुम एक सवाल से एक जवाब चाहते हो।
सारा जीवन सुलझना चाहते हो।
कभी टहनी, कभी मूल, कभी शाख या छाव या थड।
हर समय अलग , अनेकों उत्तर
अपने मन से उपजते, उसके मौन को समझते।
पर्बत या पेड़,
दोनो मौन है।
अड़िग है। अचल, स्थिर
एक झुकता , दूसरा झुकाता।
सवाल, झरनों सा घूमता भरमाता।
सवाल, टहनियों में बुनता पहेलियां।
एक नही अनेक।
पेड़ या पर्बत,
क्या वह अंतराय है?
या कोई अंत या ?
किस पर निर्भर है, वो तो निर्भय खड़ा,
तुझे पुकारता वो एक सवाल।
दिखता कितना बड़ा!
चल चले थोड़ा उस पर चढ़े
वही से दुनिया को देखे।

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